जंगल है आधी रात है...
घने जंगल में, आदिमो की बस्ती में,
था एक छोटा सा घर मेरा...
घर में था अकेला, बच्चों को पढाने वाला,
जैसे एक अध्यापक...
आधी अंधियारी रात में, थंड से सिकुडन भरती हवाओ में,
दर पर सुनी ठक ठक सी आवाज...
खडी थी एक अबला, थंड से कपकपाती,
अकेले भयभीत...
स्वागत किया उसका, मानो वह लक्ष्मी-सरस्वती हो,
गर्म चाय दी और दिये ओढने को कुछ कपडे...
फिर मैं निकला चौखट के बाहर, शॉल ओढे,
वो बोली... ठंड है, जंगली जानवर है,
तुम कैसे सहोगे...
मैं हंस कर बोला...
सह लुंगा ठंड, कर लुंगा जानवरों से संघर्ष,
जान पर आयी तो योद्धा बन जिवित रहुंगा,
चौखट के भितर रहुँ तो,
किस किस को जवाब दूंगा?
बाळराजे
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